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उनकी चिताओं पर भी लगेंगे किसी बरस मेले!


ये इक्कीस लोग बहुत जल्दी भुला दिए जाएँगे। देश को यह चेतावनी देने के लिए, कि दुश्मन घर तक पहुँच गया है, इनके प्राणों का उत्सर्ग भी कभी याद नहीं किया जाएगा।



हिन्दुस्तान की महानगरी एक बार फिर दुश्मनों के आतंक से छलनी हो गई है। दौड़ती-भागती जिंदादिल महानगरी को तीन धमाकों ने लहूलुहान कर दिया और देश के २१ नागरिकों को अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी। सैकड़ों जख्मी हो गए हैं। उन्होंने अपना काम कर दिया और उसके बाद देश में वह सब दोहराया गया जैसा ऐसे आक्रमण के बाद होता रहा है। टीवी चैनलों ने सनसनी बाँटी, खून दिखाया, पुलिस ने हाई अलर्ट किया, हेल्पलाइन नंबर खोले गए, घायलों को अस्पताल में दिखाया गया, नेताओं के दौरे हुए, सोनिया और प्रधानमंत्री भी घायलों से मिलने मुंबई आए और मृतकों के परिजनों को २ लाख रु. तथा गंभीर घायलों को एक लाख रुबए की सहायता की घोषणा भी की।

लेकिन किसी ने यह नहीं माना कि यह कोई साधारण दुर्घटना नहीं है, देश की अस्मिता और स्वाभिमान पर सीधा हमला है। ६४ साल से आजाद देश में दुश्मन आपके बीच पहुँच कर आपको ललकार रहा है और आपका सूचना तंत्र सुन्ना पड़ा है। सारे जिम्मेदार कयास लगा रहे थे और कोई भी इस स्थिति में नहीं था कि कुछ बता सके। वे लोग, जिन्होंने संविधान की शपथ ली है, ३१ माह तक आपको सुरक्षित रखने का एहसान जता रहे थे। देश के भावी प्रधानमंत्री अभी से मान चुके थे कि दुश्मनों के हर हमले को रोकना नामुमकिन है। समझना मुश्किल था कि ४० साल के इस सर्वगुण संपन्ना युवा की आवाज में इतनी लाचारी क्यों थी ?

सबसे ज्यादा तो अफ़सोस तब हुआ जब प्रधानमंत्री ने इस आतंकी घटना से उपजे दुःख, क्षोभ और ग्लानि को महज करोड़ - दो करोड़ के मुआवजे के बराबर मान लिया। दुश्मन घर में घुस कर जान ले ले तो मरने वाले बेगुनाह को शहीद क्यों नहीं माना जाना चाहिए? उन्हें किसी दुर्घटना में मरा मान लेना तो चरम असंवेदनशीलता है। ठीक है कि वे सरहद पर दुश्मनों से लड़ने नहीं गए थे लेकिन इस देश में जीने का उनका अधिकार तो संविधान ने उन्हें दिया है। क्या संविधान में यह लिखा है कि ऐसी घटनाओं में गई जानो की कीमत दो लाख रु. रहेगी?

ये इक्कीस लोग बहुत जल्दी भुला दिए जाएँगे। देश को यह चेतावनी देने के लिए, कि दुश्मन घर तक पहुँच गया है, इनके प्राणों का उत्सर्ग भी कभी याद नहीं किया जाएगा। उनके क्षत-विक्षत शवों का खौफनाक मंजर और उनके परिजनों का हृदयविदारक आर्तनाद भी यह अंधी और बहरी सरकार कभी याद नहीं रख पाएगी। जिस देश के प्रधानमंत्री के कार्यकाल में, उनकी आँखों के सामने, उनके मंत्री जितने रुपयों का भ्रष्टाचार करते हैं उसे गिनना भी आम आदमी के लिए संभव नहीं है, तो उस आम आदमी की जान का मोल दो लाख से ज्यादा क्या रखा जाए? उसे भी किसी गाँव की बिना फाटक की रेलवे लाइन के कारण हुई दुर्घटना में मरे आम आदमी जैसा मान लेना, किसी संगीन अपराध से कम नहीं है।

ये तो नाइंसाफी है। आतंकवाद की बलिवेदी पर मरने वालों की मौत को भी शहादत का दर्जा मिलना चाहिए। माना कि उनके शव क्षत-विक्षत हो गए थे फिर भी वे तिरंगे में लपेटे जाने के काबिल थे। उनके अंतिम संस्कार में भी बंदूकें उलटी की जाना चाहिए थीं। जब देश की आन-बान और शान के तिरंगे को दुश्मन ही झुका गए तो इन बेसमय बिदा हो लिए लोगों के गम में भी थोड़ी देर तो तिरंगा झुकाना चाहिए था...कि वे भी वतन की खातिर मरे हैं...कि उनकी चिताओं पर भी कभी मेले लग सकते हैं।

चलेंगे हम भी कभी सिर उठा के

 आखिरकार मरना तो सभी को है, लेकिन पाकिस्तानी पत्रकार सलीम शहजाद को जल्दबाजी में नहीं मारा गया। हत्यारे नें उन्हें सुधरने का अवसर दिया होगा, लेकिन सलीम शहजाद दिमाग से ज्यादा दिल से काम लेते थे, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सिद्धांतों पर अमल करते थे और पत्रकारिता की परिभाषा के तहत ही काम करते थे। सलीम शहजाद को शायद पता नहीं था कि पाकिस्तानी समाज में अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता के मूल सिद्धांतों और शायद पत्रकारिता की परिभाषा के ज्यादा मायने रह नहीं गए हैं। एक पत्रकार का काम सच लिखना है, लेकिन ऐसा कई लोगों को नागवार गुजरता है। सलीम शहजाद को किसने मारा यह सब जानते हैं और ये भी कि इस तरह के कारनामों को पाकिस्तान में कौन अंजाम देता है। शहजाद से नाराजगी एक खबर के बारे में थी। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में अलकायदा और पाकिस्तानी नौसेना के कुछ अधिकारियों के बीच कथित संबंधों का उल्लेख किया था। उन्होंने घर के भेदी को जनता के सामने लाने की कोशिश की थी। नतीजा ये कि इसके कुछ ही दिन बाद वह अचानक गायब हो गए और फिर उनका शव मिला। अनेक पर्यवेक्षक और जानकार मानते हैं कि नि:संदेह पाकिस्तानी सत्ता व्यवस्था और कुछ चरमपंथी तत्वों के बीच संबंध हैं। कराची में नौसेना के ठिकाने पर हमला हुआ तो नौसैनिक अड्डे के भीतर से ही चरमपंथियों को मदद भी मिली। उससे पहले 2009 में सेना के मुख्यालय पर हमला हुआ था तो उस समय भी कुछ सैन्य अधिकारियों ने हमलावरों को संवेदनशील जानकारी दी थी। पत्रकारों ने जब भी इन मुद्दों पर या फिर सेना के खिलाफ लिखा है तो वह कम से कम कुछ दिनों के लिए आइएसआइ के मेहमान जरूर बने हैं। हम भी दो बार वहां चाय पी चुके हैं। ख़ुशकिस्मती है कि आज भी हम आपके लिए लिख रहे हैं। बलूचिस्तान के तो मेरे कुछ ऐसे मित्र हैं जिनका अभी तक कोई पता ही नहीं चल सका है। आइएसआइ के अधिकारी जब भी पत्रकारों से मिलते हैं तो उन्हें यह कहते हैं कि राष्ट्रीय हित में इस प्रकार की ख़बरें नहीं लिखनी चाहिए। इस तरह इशारे में वह साफ कर देते हैं कि पत्रकार उनके इशारे पर काम करें। ऐसा लगता है कि चरमपंथियों और सेना के संबंध भी राष्ट्रीय नीति का हिस्सा हैं। बहरहाल पाकिस्तान की ख़ुफिया एजेंसियां जिस तरह से पत्रकारों के साथ व्यवहार कर रही हैं उसे देखते हुए यही कहा जा सकता है कि यह कम से कम देशहित में नहीं है।

आईएसआईगुप्तचर या आतंकी

अमेरिका ने आईएसआई को भी
अल कायदा जैसे आतंकी संगठनों की सूची में रखा है आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में पाकिस्तान अमेरिका को भले ही अपना रणनीतिक साझेदार मानकर इतराता रहा हो, लेकिन अमेरिकी अधिकारी उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई को एक आतंकवादी संगठन ही मानते हैं। ब्रिटिश अखबार "गार्डियन" में इस आशय की खबर पर संदेह करने का कोई कारण नहीं बनता, क्योंकि न तो अमेरिका ने और न पाकिस्तान ने ही इस खबर को गलत बताया है। अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने इस जानकारी की कड़े शब्दों में निंदा तो जरूर की है, लेकिन खबरों की सच्चाई और उसके गलत होने के बारे में चुप्पी बरतना ही उचित समझा है। ग्वांतानामो बे में जाँचकर्ताओं को बताया गया था कि आतंकवादी संगठन अल कायदा, हमास और हिज्बुल्लाह के साथ-साथ पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई भी एक खतरनाक और खौफनाक संगठन है। खबर के मुताबिक आईएसआई को उन ३६ आतंकवादी गुटों में शामिल किया गया है, जिनमें अल कायदा के सह-प्रमुख अयमान अल जवाहिरी के नेतृत्व वाला मिस्र का इस्लामिक जेहाद, ईरान का खुफिया विभाग और इख्वानुल मुसलमीन जैसे आतंकी गुट शामिल हैं। यों तो यह सूची वर्ष २००७ की है, लेकिन इसकी संभावना कम ही है कि उसमें अब भी कोई परिवर्तन किया गया होगा। वैसे यह सूची जगजाहिर नहीं भी हुई होती, तब भी आतंकवाद के संदर्भ में आईएसआई की भूमिका को लेकर शायद ही किसी को कोई मुगालता रहा होगा। सारी दुनिया जानती है कि पाकिस्तान दुनिया का एकमात्र देश है, जो अपनी नीति और रणनीति के तहत आतंकवाद को प्रश्रय देता है। पाकिस्तान को अगर आतंकवाद की नर्सरी कहा जाता है, तो यूँ ही नहीं कहा जाता। आतंकवादी कार्रवाइयों में आईएसआई की संलिप्तता बार-बार उजागर होती रही है। मुंबई मामले में भी उसकी भूमिका रही है, अब इसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं बची है। आज दुनिया में जहाँ कहीं भी आतंकवाद है, वहाँ आईएसआई की उपस्थिति भी देखी जा सकती है। अल कायदा, तालिबान या मुजाहिदीन जैसे आतंकवादी संगठनों के लिए वह हर जरूरी सुविधा मुहैया कराती है। इतना ही नहीं, आईएसआई उन्हें प्रशिक्षण देती है और उनकी कार्रवाइयों को समन्वित करने का काम भी करती है। भारत के लिए तो वह विशेष रूप से खतरनाक रही है। कारगिल घुसपैठ और मुंबई हमले से लेकर कश्मीर तक में वह आतंकवादी कार्रवाइयों को अंजाम देने में सहायक रही है। जहाँ तक भारत की बात है, तो उसे आईएसआई की भूमिका को लेकर कभी कोई संदेह नहीं रहा। भारत राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी आतंकवादियों को शह देने की उसकी योजना का पर्दाफाश करता रहा है, लेकिन दुर्भाग्य से अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने उसे पूरी गंभीरता से नहीं लिया। इस खुलासे के बाद अमेरिका और पाकिस्तान के संबंधों में खटास पैदा होना लाजिमी है, लेकिन ऐसा लगता है कि दोनों देशों की सरकारें इसे ज्यादा तवज्जो नहीं देंगी क्योंकि इससे आतंकवाद के खिलाफ चल रही लड़ाई कमजोर हो सकती है। हाँ, पाकिस्तान को अपने गिरेबान में एक बार जरूर झाँकना चाहिए।

देश दो परंतु फैसला एक

भारत की "भँवरी बाई" या पाकिस्तान की "मुख्तारन माई" को सिर्फ इसलिए बलात्कार का शिकार होना पड़ा कि वे महिला अधिकारों की लड़ाई लड़ रही थीं। यह अजीब इत्तफाक है कि अदालत से दोनों को न्याय नहीं मिला।

शासकीय, प्रशासकीय स्तर पर भारत-पाकिस्तान के बीच चाहे जितनी दुश्मनी हो लेकिन औरत की स्थिति तथा उसके प्रति नजरिए में कई बार समानताएँ भी देखने को मिलती हैं। हाल में पाकिस्तान की न्यायपालिका भी लगभग एक तरह के मामले में भारत की न्यायपालिका के नक्शेकदम पर चली है। पाकिस्तान की मुख्तारन माई के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना में शामिल छः आरोपियों में से पाँच को जमानत दे दी गई है, जिसने भारत की भँवरी बाई केस के हश्र की याद ताजा की है।

जयपुर के पास भटेरी गाँव की भँवरी, जो महिला सामाख्या कार्यक्रम में साथिन का काम करती थी, वह इलाके की ऊँची जाति के दबंगों के हाथों सामूहिक बलात्कार की शिकार हुई थी। उधर पाकिस्तान की मुख्तारन माई पर आरोप लगाया गया कि उसके १२ साल के छोटे भाई का ऊँची बिरादरी कही जाने वाली मस्टोई जाति के किसी महिला के साथ अवैध संबंध था। इसी को आधार बना कर बाकायदा मस्टोई जाति के पंचायत के फैसले के तहत ६ लोगों ने उसके साथ बलात्कार किया। यहाँ भी औरत के शरीर को मर्दानगी का खेल खेेलने के लिए सुनियोजित रूप से अखाड़ा बनाया गया और भँवरी के साथ भी योजनाबद्ध ढंग से एकत्र होकर उसके पति के सामने उसके साथ शारीरिक तथा यौनिक हिंसा हुई।

अदालतों को देखिए कि तमाम सबूतों और मामलों के राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियाँ बनने के बावजूद भँवरी को न्याय नहीं मिला। राजस्थान की निचली अदालत ने केस खारिज करते हुए जो तर्क दिया था वह विचलित करने वाला था। भँवरी के बलात्कारियों में रिश्ते में चाचा एवं भतीजा लगने वाले दो लोग भी शामिल थे। अदालत ने अपने फैसले में भारतीय संस्कृति का गुणगान करते हुए कहा कि ऐसे "गंदे काम में" ऐसे दो साथ नहीं रह सकते। आरोपियों को जमानत मिल गई और पिछले डेढ़ दशक से प्रस्तुत केस हाई कोर्ट में लटका हुआ है।

उधर मुख्तारन अपने साथ होने वाली हिंसा और अन्याय के खिलाफ लड़ रही है लेकिन एक को छोड़ बाकी पाँचों रिहा हो गए। पाकिस्तानी महिला अधिकार कार्यकर्ताओं को तथा प्रगतिशील लोगों को लगता है कि उनके देश में महिलाएँ महफूज नहीं हैं और हमारे यहाँ भी जो स्त्री अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं, उन्हें भी महिलाओं की सुरक्षा खतरे में पड़ी दिख रही है।

दोनों ही मामलों में सिल्वर लाइनिंग अर्थात सकारात्मक चीज यही कही जाएगी कि दोनों ने अपने साथ हुए इस अन्याय का मुकाबला किया और वे आज भी संघर्षरत हैं। मुख्तारन को यहाँ की भँवरी की तरह भले ही न्यायालय से न्याय नहीं मिला हो किंतु वह महिलाओं के खिलाफ होने वाले यौनिक हिंसा के विरुद्ध न्याय की लड़ाई की अब प्रतीक बन चुकी है। खुद अनपढ़ मुख्तारन अब एक स्कूल चला रही है।

ईशनिंदा के नाम पर


कट्टरपंथियों ने अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री शहबाज भट्टी को मौत की नींद सुला दिया पाकिस्तान में उदारता, सहिष्णुता व असहमति की एक और आवाज को हमेशा-हमेशा के लिए खामोश कर दिया गया। मजहबी कट्टरपंथियों ने अल्पसंख्यक मामलों के केंद्रीय मंत्री शहबाज भट्टी को मौत की नींद सुला दिया। दो महीने पहले ही पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के गवर्नर सलमान तासीर भी इसी धर्मांधता के शिकार हुए थे। सलमान तासीर की तरह शहबाज भट्टी का भी "गुनाह" यही था कि उन्होंने पाकिस्तान के विवादित ईशनिंदा कानून में बदलाव की माँग का समर्थन किया था। शहबाज भट्टी कैथोलिक ईसाई थे और ईशनिंदा कानून की मुखर आलोचना करने के कारण उन्हें पिछले दिनों हत्या की धमकियाँ भी मिली थीं। मरहूम जनरल जिया उल हक की हुकूमत के समय बने इस कुख्यात कानून के तहत कुरआन शरीफ, मजहब-ए-इस्लाम और पैगंबर हजरत मोहम्मद व अन्य मजहबी शख्सियतों के बारे में कोई भी आलोचनात्मक टिप्पणी करने पर सजा-ए-मौत हो सकती है। हाल के दिनों में यह कानून तब चर्चा में आया, जब पाँच बच्चों की ४५ वर्षीय माँ आसिया बीबी को गत नवंबर माह में इस कानून के तहत मौत की सजा सुनाई गई। आसिया बीबी पर आरोप है कि उसने मोहम्मद साहब के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी की थी। हालाँकि आसिया बीबी इस आरोप को नकारती रही है और उसका कहना है कि उस पर आपसी रंजिश के चलते यह आरोप मढ़ा गया है। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की वरिष्ठ सांसद शेरी रहमान ने आसिया बीबी का बचाव करते हुए इस कानून में संशोधन के लिए एक निजी विधेयक भी नेशनल असेंबली में पेश किया था जिसके कारण उन्हें भी धमकियाँ मिलीं। आखिरकार अपने ही पार्टी नेतृत्व के दबाव के चलते शेरी रहमान को यह विधेयक वापस लेना पड़ा। पाकिस्तान के कई उदारवादी समूहों और बुद्घिजीवियों ने भी आसिया बीबी का बचाव करते हुए इस कानून में सुधार की माँग की है। इस कानून का सबसे ज्यादा शिकार अल्पसंख्यक, खासकर ईसाई समुदाय के लोग होते हैं। पाकिस्तान में ईसाइयों की आबादी कुल आबादी की मुश्किल से तीन प्रतिशत है। शहबाज भट्टी इस समूह के सबसे बड़े नेता थे। जाहिर है कि उनकी हत्या के बाद ईसाई समुदाय अपने को और ज्यादा असुरक्षित महसूस करेगा। अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री शहबाज भट्टी की हत्या से इस बात की पुष्टि हो जाती है कि पाकिस्तान में सहनशीलता की संस्कृति का अंत हो गया है। पाकिस्तान सरकार में शहबाज भट्टी अकेले गैर मुस्लिम मंत्री थे। उनकी हत्या से पाकिस्तान सरकार से अल्पसंख्यकों का भरोसा उठ गया है। वे हर पल असुरक्षा के माहौल में जीने को अभिशप्त हैं। भट्टी की हत्या के बाद पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों का कोई अभिभावक नहीं रहा। जरदारी प्रशासन देश के अल्पसंख्यकों के इस खोए हुए भरोसे को लौटा सकेगा, यह उम्मीद भी दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही है। शहबाज भट्टी की हत्या से चरमपंथ और आतंकवाद को खत्म करने के पाकिस्तान सरकार के इरादे पर भी प्रश्नचिह्न लगा है। भट्टी की हत्या से साफ है कि तालिबानी ताकतों पर पाकिस्तानी सरकार का नियंत्रण नहीं रह गया है। शहबाज भट्टी को ईशनिंदा कानून में सुधार के लिए अभियान चलाने की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी है। दरअसल, धर्मांध ताकतों ने ईशनिंदा कानून को उदारवादियों को दबाने का औजार बना लिया है। ताजा हालात में पाकिस्तान का यह संकट कुछ-कुछ राजनीतिक भी लगता है, क्योंकि आसिफअली जरदारी और युसूफ रजा गिलानी की अल्पमत हुकूमत कुछ कट्टरपंथी राजनीतिक समूहों के समर्थन से ही चल रही है।यह चुनौती इसलिए कड़ी है क्योंकि फौज का तालिबान को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष समर्थन हासिल है। चरमपंथियों को पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई का भी समर्थन हासिल है। इसीलिए भट्टी की हत्या की जिम्मेदारी लेने वाले तालिबान के खिलाफ पाकिस्तान सरकार ने अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की है। कहने की जरूरत नहीं कि तालिबानी ताकतों की हरकतों की निंदा के लिए भी जो राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए, उसका पाकिस्तान में अभाव दिखता है। विपक्षी जमात ए इस्लामी ने तो उल्टे आतताइयों की कार्रवाई का समर्थन किया है। पाकिस्तान में चरमपंथ का जो भी नाम हो-अलकायदा, तालिबान या लश्कर ए तैयबा, उसका मकसद पूरे पाकिस्तान में पंथिक कट्टरता आधारित आतंकवाद फैलाना है। सत्ताधारी दल के नरम रुख के कारण समूचा पाकिस्तान तालिबान के लिए निरापद पीठ बना हुआ है। इसी कारण एक तरफ तालिबान की ताकत बढ़ी है तो दूसरी तरफ सरकार की दुर्बलता जगजाहिर हुई है। तालिबानी ताकतों के विरोध प्रदर्शनों से घबराई पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने ईशनिंदा कानून में संशोधन के फैसले से अपने कदम पीछे खींच लिए तो उससे सरकार की कमजोरी ही सामने आई थी और चरमपंथियों का मनोबल बढ़ गया था। यदि पाकिस्तान सरकार चरमपंथियों के सामने नहीं झुकती और ईशनिंदा कानून में संशोधन के अपने फैसले पर अडिग रहती तो आज धर्माधता के खिलाफ खड़ा होने में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को सहूलियत होती। जरदारी प्रशासन की दुर्बलता दूसरे शब्दों में लोकतंत्र की दुर्बलता भी है। पाकिस्तान इस मामले में बड़ा अभागा देश है कि वहां एक समूची पीढ़ी सैनिक शासन में पली और बड़ी हुई। लोकतंत्र के लिए वह देश आज भी नौसिखिया है। लोकतंत्र के कमजोर होने के कारण ही वहां धर्माध ताकतें फल-फूल रही हैं। वहां लोकतंत्र बंदूक की नोक पर चल रहा है। कट्टरता के पोषण के लिए आज पूरे पाकिस्तान को विपन्न कर दिया गया है। पूरा देश बारूद के ढेर पर बैठा है। वहां बारूद का ढेर अचानक नहीं लगा। वह अनवरत इकट्ठा होता रहा। अतीत में उसी की परिणति पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री लियाकत अली खान, जुल्फिकार अली भुट्टो से लेकर बेनजीर भुट्टो की हत्या के रूप में हुई थी। जिन्होंने बेनजीर को मारा, उन्होंने ही सलमान तसीर और शहबाज भट्टी को मारा है। आज हाल यह है कि पाकिस्तान के अधिकतर प्रारंभिक शैक्षणिक प्रतिष्ठान चरमपंथ सिखाने के केंद्र बन गए हैं। पाकिस्तान के जन्म के समय मदरसों की संख्या 137 थी, जो आज बढ़कर पचास हजार से अधिक हो गई है। ये मदरसे कट्टरता की आरंभिक पाठशाला हैं। यह भी याद रखना चाहिए कि यदि पाकिस्तान में लोकतंत्र मजबूत रहता तो कट्टरता से लड़ा जा सकता था। पाकिस्तान में यदि लोकतंत्र मजबूत रहता तो वहां अग्रगामी व प्रगतिशील ताकतें मजबूत होतीं। प्रतीत होता है कि जरदारी और गिलानी को भी लोकतंत्र को मजबूत बनाने से ज्यादा अपनी कुर्सी बचाने की चिंता है। जरदारी व गिलानी को यह समझ कब आएगी कि उन्मादी चरमपंथी ताकतों की मौजूदा हरकतें यदि जारी रहीं तो उनकी सत्ता भी निरापद नहीं रहेगी। आज भी वे कहने के लिए ही राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री हैं। कल नहीं तो परसो फौज द्वारा सत्ता संभालने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। जरदारी व गिलानी को यह भी स्मरण रखना चाहिए कि सत्ता में बैठे लोग यदि दकियानूसी विचारों से मुक्त नहीं होते तो वे उन्मादी चरमपंथी तत्वों से नहीं लड़ सकेंगे।