हमारे देश में शायद ही कोई क्षेत्र ऐसा होगा जहां नीचे से ऊपर तक भ्रष्टाचार का बोलबाला न हो। आम आदमी को अपने जमीन-जायदाद संबंधी कागजात, जाति और निवास प्रमाणपत्र से लेकर ड्राइविंग लाइसेंस जैसे मामूली दस्तावेजों के लिए भी कई दिन तक दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं और फिर घूस देकर ही उन्हें हासिल कर पाता है। हमारे यहां 77 फीसदी रिश्वत काम वक्त पर कराने या कारोबारी नुकसान से बचने के लिए दी जाती है। रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए जो भी उपाय किए गए वे नक्कारखाने में तूती ही साबित हुए। इसका कारण यह रहा कि भ्रष्टाचार से निपटने के लिए बनी संस्थाओं को पूरे अधिकार नहीं सौंपे गए और न ही राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखा गया, फिर दोषियों को मिलने वाले संरक्षण और उन पर होने वाली कार्रवाई में देरी से भी कई मामले बीच में ही दम तोड़ देते हैं। अब तक का अनुभव यही रहा है कि जब-जब भ्रष्टाचार, काले धन का मामला जोर-शोर से उठता है तब सरकार जांच आयोग बिठा देती है जिससे मामला ठंडा पड़ जाता है, लेकिन पहले के जांच आयोगों की रिपोर्ट को लागू करने या विद्यमान कानूनों पर कार्रवाई करने के प्रति सरकार सोयी रहती है। उदाहरण के लिए बाबा रामदेव की भूख हड़ताल से पहले सरकार ने काले धन की जांच के लिए तीन समितियों और अलग से एक नया महानिदेशालय गठित कर दिया, लेकिन सरकार ने काले धन का पता लगाने के लिए गठित चार समितियों की सिफारिशों पर अमल के बारे में कुछ नहीं कहा। आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत में कहा गया कि उदार अर्थव्यवस्थां के तहत सरकारी नियम-कायदे उदार और पारदर्शी होंगे जिससे घोटालों और प्रशासनिक भ्रष्टाचार में कमी आएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ऊंचे पदों पर काबिज नौकरशाहों ने उदारीकरण के चलते निजी क्षेत्र के उद्यमों में ज्यादा भ्रष्टाचार की संभावनाएं खोज लीं और राजनेताओं को भी रास्ता दिखा दिया। भारतीय पूंजीपतियों के संगठन सीआइआइ ने एक बयान में कहा कि भ्रष्टाचार के कारण देश में पर्याप्त विदेशी पूंजी निवेश नहीं हो रहा है। भारत में भ्रष्टाचार का उदारीकरण व काले धन के कई माध्यम रहे हैं। मॉरीशस रूट से विदेशी कंपनियों द्वारा कर चोरी और पार्टिसिपेटरी नोट के जरिए हवाला मार्ग से भारत में काले धन का निवेश हो रहा है। उदारीकरण के दौर में हमारी संसदीय प्रणाली अब कोई विशेष मायने नहीं रखती, क्योंकि सरकार किस दिशा में चलेगी यह कॉरपोरेट समूह तय करने लगे हैं। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि नीरा राडिया जैसे बिचौलियों के जरिए बन रहे सत्ता-कॉरपोरेट व नौकरशाह के कॉकटेल को तोड़ने वाला कोई नहीं है। कॉकटेल के खेल को स्पेक्ट्रम घोटाले से समझा जा सकता है। स्वान टेलीकॉम को 1537 करोड़ रुपये में लाइसेंस मिला, लेकिन कुछ दिनों बाद ही उसने 45 फीसदी शेयर 4200 करोड़ में संयुक्त अरब अमीरात की एक कंपनी को बेच दिए। इसी तरह यूनिटेक वायरलेस को स्पेक्ट्रम का लाइसेंस 1661 करोड़ में मिला और यूनिटेक ने नार्वे के टेलीनोर को 60 फीसदी शेयर 6120 करोड़ में बेचे। आज कॉरपोरेट लॉबीइंग हो रही है जो उदारीकरण की ही देन है। यह कहानी भारत की ही नहीं, बल्कि ब्राजील, रूस, चीन, मलेशिया जैसे देशों की भी है जिन्होंने पिछले दो-तीन दशकों में अपने बाजार खोले हैं। अमेरिका के रोचेस्टेर इंस्टीट्यूट ने भ्रष्टाचार और उदारीकरण के संबंधों का विश्लेषण करते हुए यह निष्कर्ष निकाला कि जिन देशों में लोकतंत्र पहले और आर्थिक उदारीकरण बाद में आया है वहां मुक्त बाजार ने भ्रष्टाचार को नए आयाम दिए हैं। उदारीकरण अनंत अवसर, नियंत्रणों से मुक्ति और पैसे की आंधी लेकर आता है जिसके सामने लोकतंत्रों के कमजोर नियमन प्राय: फेल जाते हैं। यह बात भारत पर पूरी तरह फिट बैठती है।
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कैसा हो घृणित दुष्कर्मियों के साथ सलूक
दिल्ली की एक अदालत ने बलात्कार के एक मामले पर फैसला सुनाते हुए टिप्पणी की कि बलात्कारियों की सर्जिकल या फिर रासायनिक प्रक्रिया का इस्तेमाल करते हुए उनका बधियाकरण कर दिया जाना चाहिए। जज ने इसमें आगे जोड़ते हुए यह भी कहा कि यह हमारे समय की मांग भी है। दरअसल, दिल्ली के सत्र न्यायालय में एक सौतेले पिता पर अपनी नाबालिग बेटी से बलात्कार का मामला साबित होने के बाद फैसला सुनाते हुए जज ने यह कठोर टिप्पणी की। जज ने कहा कि देश के कानून बनाने वाले कर्ताधर्ताओं को रेप के अपराधियों के लिए वैकल्पिक सजा के बारे में विचार करना चाहिए। जज ने अपनी टिप्पणी में आगे कहा कि विशेष रूप से बच्चों और नाबालिगों के साथ दुष्कर्म करने वाले मुजरिमों को इस तरह की सजा देने के बारे में शिद्दत से विचार होना चाहिए। विद्वान न्यायाधीश ने अपनी इस टिप्पणी को देश के विधि मंत्रालय को भी भेजा है ताकि इस तरह के कानून बनाने के बारे में विचार के लिए एक आधार तैयार किया जा सके। सत्र न्यायाधीश की इस टिप्पणी से भारत में बलात्कारियों को शल्य क्रिया या फिर रासायनिक प्रक्रिया से नपुंसक बनाकर दंडित करने की सजा पर बहस छिड़ गई है। दरअसल, बलात्कारियों को बंध्याकरण जैसी सजा का विचार पूरे विश्व में कानून बनाने वालों को लगातार झकझोरता रहा है। पश्चिमी देशों में तो इस तरह की सजा पर लंबे समय से बहस चल रही है। सालों चली बहस के बाद कई देशों यूरोपीय और अमेरिकी देशों में तो इस तरह के कानून बने भी हैं। फिनलैंड, नॉर्वे और डेनमार्क में यौन शोषण करने वालों को शल्य क्रिया से नपुंसक बना देने की सजा का प्रावधान है। हालांकि कुछ विरोध के बाद डेनमार्क ने इसमें संशोधन करते हुए सर्जिकल बधियाकरण की जगह रासायनिक बधियाकरण के कानून को लागू किया है। इस तरह के कानून स्वीडन, कनाडा, इजराइल और अमेरिका के कई राज्यों में भी लागू हैं। कहीं ये सजा के तौर पर मान्यता प्राप्त हैं तो कहीं इन्हें वैकल्पिक सजा के तार पर इस्तेमाल किया जाता है। कुछ जगह बच्चों या नाबालिगों का यौन शोषण करने वालों के लिए ऐसी सजा मुकर्रर की जाती है। बच्चों का यौन शोषण करने वालों को इस तरह की सजा देने का प्रावधान तो अमेरिका और इंग्लैंड में भी है। अभी हाल ही में पोलैंड ने बच्चों के यौन शोषण करने वाले दरिंदों के लिए बधियाकरण को अनिवार्य बनाने के कानून को मंजूरी दी है। अब इस तरह की सजा की बात भारत में भी उठी है। जरूरत इस बात की है कि इस पर गंभीरता से विचार किया जाए। पक्ष और विपक्ष के अपने तर्क सामने आए। दरअसल, भारत में बलात्कार को लेकर अंग्रेजों के जमाने के बनाए कानून और सजाएं ही कायम हैं। हमारे देश के पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं और नाबालिग बच्चियों पर होने वाले इस जुल्म को गंभीरता से लेने की जरूरत सालों तक महसूस नहीं की गई। वर्ष 1983 में रेप के कानून में अहम बदलाव किया गया। उसके पहले तो जो भी महिला कहती थी कि उसके साथ बलात्कार हुआ है, उसे ही यह साबित करना पड़ता था कि उसकी मर्जी के बगैर उसके साथ आरोपी ने जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाए। इस तरह के बर्बर कानून इस देश में वर्षो तक चलते रहे। यह जानकार हैरानी होगी कि इस देश में यह जानने के लिए कि रेप की शिकार अविवाहित महिला सेक्सुअली एक्टिव थी या नहीं, अमर्यादित सलूक किया जाता है। जिस देश में इस तरह की व्यवस्था हो तो यह समझा जा सकता है कि देश के रहनुमा रेप की सजा और उसके पीडि़त को लेकर कितने गंभीर हैं। बच्चों और नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण को लेकर कोई सख्त कानून इस देश में अब भी नहीं हैं। हाल के दिनों में स्कूलों में बच्चों के यौन शोषण की घटनाएं बढ़ी हैं। इन बढ़ती घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए कड़े कानून की आवश्यकता है। जब भी कोई ऐसी वारदात सामने आती है और मीडिया में इस पर हंगामा मचता है तो केंद्र सरकार चिंता जताती है, लेकिन फिर वह कुंभकर्णी नींद में सो जाती है। दिल्ली में एक कैब ड्राइवर की बच्चों के यौन शोषण का मामला हो या फिर कानपुर के एक स्कूल की बच्ची दिव्या के साथ दरिंदगी का मामला, सरकार हर बार इस तरह की वारदातों को रोकने के लिए कठोर कानून बनाने का आश्र्वासन देती है। महिला और बाल विकास मंत्रालय चंद दिनों की सक्रियता के बाद अन्य कामों में मशरूफ हो जाता है। कुछ दिनों पहले मद्रास हाईकोर्ट ने एक फिजिकल ट्रेनिंग इंस्ट्रक्टर को चौथी कक्षा की छात्रा के साथ बलात्कार का दोषी पाया। कानून के मुताबिक उसे दस साल की सजा दी गई। सजा सुनाते वक्त मद्रास हाईकोर्ट के न्यायाधीश ने भी कहा था कि हमारे समाज में बच्चों की बढ़ती यौन शोषण की घटनाओं को रोकने के लिए एक बेहद ही कड़े कानून की आवश्यकता है, लेकिन बावजूद उसके अब तक सरकार की ओर से कोई ठोस पहल भी नहीं हुई है। यौन शोषण या रेप के केस में अदालती कार्रवाई में होने वाली देरी और कानूनी उलझनों और पेचीदिगियों से मामला उलझ जाता है और कानून की खामियों का फायदा उठाकर आरोपी बच निकलते हैं। जरूरत इस बात की है कि बलात्कारियों को इस तरह की सजा देने का प्रावधान हो कि ताकि इस तरह के अपराध करने वालों के मन में एक डर व्याप्त हो। रेप या बलात्कार एक ऐसा घृणित अपराध है, जिसके लिए जितनी भी सजा दी जाए, वह कम है। बलात्कारियों को रासायनिक क्रिया से या फिर केमिकल के इस्तेमाल से नपुंसक बना ही दिया जाना चाहिए, ताकि भविष्य में कोई दूसरा इस तरह के अपराध को अंजाम देने के बारे में सोचते हुए भी डरे। कई मानवाधिकार संगठन और कानून के जानकार बलात्कार के मुजरिम को नपुंसक बना देने की सजा का विरोध कर रहे हैं। उनका तर्क है कि यह व्यक्ति विशेष के मानव अधिकारों का उल्लंघन है। इस सजा का विरोध करने वाले यह भूल जाते हैं कि रेप की शिकार लड़की या महिला और उसका पूरा परिवार समाज में जिस तरह की जिल्लत झेलता है, उसके बरक्स किसी भी तरह की सजा मानवाधिकार का उल्लंघन हो ही नहीं सकता है। क्या किसी महिला को यह अधिकार नहीं है कि वह समाज में इज्जत की जिंदगी जी सके। क्या उसे यह अधिकार नहीं है कि उसकी जिंदगी में जहर घोलने वाले भेडि़ए को सख्त से सख्त सजा मिले। कानून के चंद जानकार बलात्कारियों को बधियाकरण की सजा का विरोध इस आधार पर करते हैं कि हम एक सभ्य समाज में रहते हैं और किसी भी व्यक्ति को पशुओं जैसी सजा नहीं दी जा सकती है। यह तर्क देने वाले कहीं न कहीं यह भूल जाते हैं कि पशुओं का व्यवहार करने वाले बलात्कारियों को पशुओं जैसी सजा देने में कोई हर्ज भी नहीं है। कुछ समाज विज्ञानियों के विरोध का आधार वही है, जो सजा-ए-मौत देने के विरोध का आधार है। उनका मानना है कि सही सुरक्षा वयवस्था और न्यायिक प्रक्रिया में सुधार लाकर ऐसे अपराध पर अंकुश लगाया जा सकता है। यह बात एक हद तक सही हो सकती है कि न्यायिक प्रक्रिया में सुधार और तेजी से सुनवाई कर मुजरिमों को जल्द से जल्द सजा देने से अपराध पर लगाम लगाया जा सकता है, लेकिन जब तक कानून और सजा का भय नहीं होगा तो इसको रोकना लगभग नामुमकिन है। बधियाकरण एक ऐसी ही सजा है, जिसका खौफ अपराधियों को अंदर तक डरा सकता है और बलात्कार जैसे घृणित अपराध को अंजाम देने के पहले सौ बार सोचने को मजबूर कर देगा। इस तरह की सजा के लिए कानून में जल्द से जल्द संशोधन किया जाए और बधियाकरण की सजा को उसमें शामिल किया जाए।
इस दखलंदाजी का दर्शन क्या है
हाल में दिल्ली हाईकोर्ट में तलाक के एक मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस कैलाश गंभीर ने कहा कि शादीशुदा लड़की के जीवन में माता-पिता को बिन बुलाए जज नहीं बन जाना चाहिए। उन्होंने माता-पिता की अनावश्यक दखलंदाजी पर नाराजगी जताई। लड़के की तरफ से यह बताया गया था कि उसके सास-ससुर हमेशा उसके वैवाहिक जीवन में हस्तक्षेप करते हैं। निरपेक्ष ढंग से देखें तो जज साहब का नजरिया बिल्कुल सही है, क्योंकि किसी को भी किसी के निजी जीवन में जब तक कि मदद मांगी न जाए, दखल नहीं देना चाहिए। मगर तीसरी दुनिया के हमारे मुल्क में हकीकत यही नजर आती है कि माता-पिता या परिवार के बड़े-बुजुर्ग दरअसल बड़े हो चुके तथा अपनी गृहस्थी को स्वयं चलाने वाले बच्चों को भी व्यावहारिक रूप से नासमझ मानते हैं। अक्सर ही बड़ों को यह मुगालता होता है कि वह जो बता रहे हैं, वह सही और उचित है। जबकि नदी की अविरल धारा की तरह चलने वाली जिंदगी में उनकी तमाम बातें उस अतीत को संदर्भित किए होती हैं, जो कभी लौटने वाली नहीं होती। अगर जज साहब की टिप्पणी की ओर लौटें तो गौर कर सकते हैं कि उनकी टिप्पणी शादीशुदा बेटियों के लिए है, शादीशुदा बेटों के लिए नहीं।। हो सकता है यह फैसला देते वक्त किसी केस की विशेष परिस्थिति रही हो, लेकिन आमतौर पर परिवारों में सिर्फ लड़की के मां-बाप ही नहीं लड़के के मां बाप भी हस्तक्षेप करते हैं और रिश्तों में तनाव इस वजह से भी आता है। हमारे समाज में यही रीति चली आ रही है कि लड़की का दूसरा घर हो जाता है और लड़के का वही रहता है। कई बार देखा गया है कि जहां पति-पत्नी के आपसी संबंध भी इसी वजह से टकराव में बदल जाते हैं, जब लड़के के माता-पिता की उनके परिवार में साधिकार होती दखलंदाजी के मसले को दोनों हल नहीं कर पाते हैं। कुछ मातृवंशी समुदायों में लड़की माता-पिता के घर में रहती थी, लेकिन वहां भी स्थिति बदली है और अब ऐसा अपवादस्वरूप ही होता है। परंपरा और संस्कृति से बदलाव में सामंजस्य लड़की को करना होता है। ससुराल की संस्कृति में उसे रचने-बसने की अपेक्षा होती है। यह अलग बात है कि लड़के कभी भी अपने ससुराल की संस्कृति में नहीं खपते हंै यानी विस्थापित लड़कियां होती हंै, लड़के नहीं। इस विस्थापन के कई सारे प्रतिकूल असर रिश्तों पर भी पड़ते ही है। यह तो सही है कि दोनों जगह बराबर नहीं हो सकता है, क्योंकि इसमें दोनों पक्षों के सामने कई तरह की व्यावहारिक दिक्कतें भी आ सकती हैं। पर इतना तो है ही कि इसमें हमारे यहां इस तरह के गैर-बराबरीपूर्ण रिश्तों का प्रतिबिंब भी देखा जा सकता है। भारतीय परिवार में लड़का-लड़की बराबर नहीं समझे जाते हैं। इसका एक बड़ा कारण लड़की का दूसरे घर जाना होता है। इसमें उसके द्वारा वंश परंपरा का आगे नहीं बढ़ना भी शामिल होता है तथा माना जाता है कि वह मां-बाप के बुढ़ापे का सहारा नहीं है। परंतु इसका मतलब यह नहीं है कि व्यावहारिक रूप से जो भी समस्याएं आए उनका जवाब तलाशने की कोई कोशिश ही न की जाए। कल्पना करें बेटा या बेटी शादी के बाद जब अपनी नई गृहस्थी बसाने योग्य बन जाते हैं तब यदि वे अपनी नई गृहस्थी न इस घर में और न उस घर में बसाकर स्वतंत्र रूप से बसाएं ताकि कोई भी विस्थापित न हो तथा हर माता-पिता के घर में बेटा-बेटी बराबर का दर्जा भी पाएं तो इसमें किस तरह की समस्या हो सकती है? इसमें एक प्रतिक्रिया यह भी आ सकती है कि यह तो परिवार को और छोटा करके तोड़ देने वाली बात है। हमारे यहां तो संयुक्त परिवार की परंपरा रही है और उसका महिमामंडन आज भी होता है, बिना इस बात की परवाह किए कि वहां पति और पत्नी के रिश्ते कितने तनावपूर्ण थे और महिलाओं की वास्तविक स्थिति क्या थी? संयुक्त परिवारों के प्रति यह सम्मोहन इस हकीकत से बिल्कुल विपरीत दिखता है जो उन सर्वेक्षणों में उजागर होती है, जिनसे पता चलता है कि अब ऐसे परिवार नाममात्र को ही रह गए हैं और अधिकतर जोर नाभिकीय परिवार अथवा न्यूक्लियर फैमिली बनने की तरफ ही है। वर्तमान समय में यह समझने की आवश्यकता है कि जिम्मेदारी बोध साथ-साथ रहने से आ ही जाएगा यह कोई जरूरी नहीं। अलग-अलग रहकर भी दोनों पक्षों द्वारा अपनी जिम्मेदारी निभाई जा सकती है। माता-पिता अथवा परिवार के अन्य सदस्य जब अशक्त हो जाएं या फिर जब जरूरत हो तब वह उनके साथ रह सकते हैं या उन्हें अपने साथ रखा जा सकता है। परंतु अधिकतर माता-पिता बच्चों की शादी के बाद भी शारीरिक रूप से सशक्त होते हैं तथा अपनी गृहस्थी स्वयं चलाने में पूरी तरह सक्षम होते हैं। यहां एक बात और स्वीकार करने लायक है कि बच्चे का परिवार भी माता-पिता के जीवन में दखलंदाजी करने लगता है। खुद दिल्ली के तथा दूसरे जगहों के न्यायालयों में ऐसे केस दर्ज हुए हंै जिसमें माता-पिता ने शिकायत दर्ज कराई कि उनके बेटे या बहू ने उनकी संपत्ति पर कब्जा कर रखा है। नोएड़ा की एक महिला जो विधवा हंै उन्हें उनके बेटे ने घर से निकाल दिया तथा वे किराए के घर में रहती हंै और पति की पेंशन जो उन्हें मिलती है उसी से अपना गुजारा करती हैं, जबकि उनके पास लाखों की अचल संपत्ति होती है। इस संदर्भ में दिल्ली स्थित तीस हजारी कोर्ट के एक मजिस्ट्रेट का भिक्षुकगृह के एक दौरे का अनुभव चौंकाने वाला लग सकता है। मालूम हो कि भिक्षुक गृह वह जगह होती है जहां शहर में भीख मांगते पकड़े गए लोग एक तरह से बंदी बनाकर रखे जाते हैं। जब संबंधित मजिस्ट्रेट ने लामपुर भिक्षुकगृह का अचानक दौरा किया तो 50 भिक्षुक ऐसे मिले जिनका अपना मकान और संपत्ति है तथा वे पढ़े-लिखे हैं, लेकिन बच्चों ने उन्हें घर से निकाल दिया है। दरअसल बैकुंठ शर्मा नाम के एक बुजुर्ग ने कोर्ट में केस दायर किया था कि उनके साथ दोहरा अन्याय हुआ है। एक तो बच्चों ने उन्हें उनके अपने मकान से निकाल दिया और जब वे मजबूर होकर भीख मांग रहे थे तो दिल्ली पुलिस ने पकड़कर उन्हें भिक्षु सुधारगृह में डाल दिया। उन्होंने अदालत में अपील की कि उनके भरण पोषण इंतजाम किया जाए। वैसे बुजुर्गो का मामला तो आज के समाज में एक अलग से ही चर्चा का विषय है, लेकिन यह घटनाएं बताती हैं कि किस तरह समाज में उनकी उपेक्षा की जा सकती है। रही बात रिश्तों की अथवा माता-पिता या बेटा-बेटी के जीवन में हस्तक्षेप की तो इस बात का आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है कि कहां उनके सहयोग और समर्थन की जरूरत है और कब वह गैर जरूरी हो जाता है। काउंसलिंग का एक बुनियादी नियम है कि जब तक कोई सलाह नहीं मांगे तब तक उसे देना नहीं चाहिए। भारत में तो व्यक्तिगत अधिकारों के प्रति अहसास इतना कम है कि लोग राह चलते भी दूसरों को सलाह देना नहीं भूलते, बल्कि वह इसे अपना जरूरी फर्ज समझते हैं।
बीच बहस में फिर आया अश्लीलता का मुद्दा
बीच बहस में फिर आया अश्लीलता का मुद्दा
इस बात पर गौर करना जरूरी है कि अश्लीलता और श्लीलता के मानक महज महिलाओं के संदर्भ में तय किए जाएँ या पुरुषों को भी इसमें शामिल किया जाए। इस पर गौर नहीं करने से बात अधूरी ही रहेगी।
थॉमस मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को केंद्र सरकार की प्रतिष्ठा पर एक और आघात
आखिरकार वही हुआ जिसका डर केंद्र सरकार को सता रहा था, उच्चतम न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश एसएच कपाडि़या की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने प्रधानमंत्री को तगड़ा झटका देते हुए केंद्रीय सतर्कता आयुक्त पीजे थॉमस की नियुक्ति को गैरकानूनी करार दिया। भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रवैया रखने वाले प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ के इस निर्णय से केंद्र सरकार और विशेष रूप से मनमोहन सिंह की साख को जबरदस्त धक्का लगा है, क्योंकि थॉमस का चयन उनकी अध्यक्षता वाली उच्चाधिकार प्राप्त समिति ने ही किया था। तीन सदस्यीय इस समिति के अन्य सदस्य थे गृहमंत्री चिदंबरम और लोकसभा में नेता विपक्ष सुषमा स्वराज। सीवीसी पद के लिए थॅामस के नाम पर विचार होते समय सुषमा स्वराज ने न केवल उनका विरोध किया था, बल्कि अपनी असहमति लिखित में भी दर्ज कराई थी। फिर भी उनका चयन किया गया। इसके बाद पूर्व चुनाव आयुक्त जेएम लिंगदोह और कुछ अन्य लोगों ने थॉमस की नियुक्ति के खिलाफ इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर कीं कि उनका नाम केरल के पॉमोलिन आयात घोटाले में शामिल है और यह मामला तिरुअनंतपुरम की अदालत में लंबित है। केरल कैडर के आइएएस अधिकारी थॉमस पर पॉमोलिन घोटाले में लिप्त होने का आरोप वर्ष 1992 में तब लगा था जब वह इस राज्य में खाद्य सचिव थे। उन पर आरोप है कि बिना टेंडर जारी किए पॉमोलिन आयात के उनके फैसले से राज्य सरकार को दो करोड़ रुपये की क्षति हुई। उन्हें इस मामले में जमानत तो मिल गई, लेकिन उनके खिलाफ मुकदमा लंबित बना रहा। इसके चलते कार्मिक विभाग ने 2000 से 2004 के बीच कई बार अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश की, लेकिन उस पर अमल नहीं किया गया। अंतत: यही मामला थॉमस पर भारी पड़ा और उच्चतम न्यायालय ने उन्हें सीवीसी पद के लिए अयोग्य ठहराते हुए उनका चयन करने वाली समिति को भी निशाने पर लिया। शीर्ष अदालत के अनुसार, सीवीसी सरीखी संवैधानिक संस्था के लिए चयन सूची में शामिल अधिकारी न केवल बेदाग छवि वाले होने चाहिए, बल्कि उनकी ईमानदारी भी असंदिग्ध होनी चाहिए। शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जब संस्था की साख का सवाल हो तो कसौटी सिर्फ जनहित होनी चाहिए। उसने प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली समिति को फटकार लगाते हुए एक ओरजहां थॉमस को सीवीसी के लिए अनुपयुक्त करार दिया वहीं दूसरी ओर भविष्य के लिए अनेक दिशा-निर्देश भी तय किए। उच्चतम न्यायालय के निर्णय के बाद केंद्र सरकार और खुद प्रधानमंत्री के समक्ष विकट स्थिति उत्पन्न हो गई है। अब विपक्ष और अधिक हमलावर हो सकता है। वह पहले से ही 2जी स्पेक्ट्रम और काले धन को लेकर सरकार की नाक में दम किए हुए है। हालांकि सरकार स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच संयुक्त संसदीय समिति से कराने पर सहमत हो गई है, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि इस प्रकरण ने उसकी जमकर किरकिरी कराई। सीवीसी मामले में सरकार थोड़ी-बहुत साख बचा सकती थी, यदि उसने समय रहते अपनी गलती का अहसास कर लिया होता। दुर्भाग्य से वह थॉमस की नियुक्ति सही ठहराने पर अड़ी रही। उसने बाकायदा हलफनामा देकर कहा कि थॉमस पाक-साफ हैं और उनके चयन पर उंगली नहीं उठाई जानी चाहिए। इसका परिणाम यह हुआ कि खुद थॉमस ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह विचित्र तर्क दिया कि जब दागी नेता सांसद बने रह सकते हैं तो वह सीवीसी पद पर क्यों नहीं रह सकते? थॉमस के बचाव में उतरी केंद्र सरकार की तब और फजीहत हुई जब यह सामने आया कि उनका चयन करने वाली समिति इससे अवगत थी कि भ्रष्टाचार का एक मामला उनके खिलाफ लंबित है। खुद गृहमंत्री को यह मानना पड़ा कि थॉमस के चयन के समय उनके खिलाफ लंबित मामले की चर्चा हुई थी, लेकिन कोई भी यह स्पष्ट नहीं कर सका कि बावजूद इसके सुषमा स्वराज की आपत्ति आखिर क्यों खारिज की गई? प्रधानमंत्री ने कहा है कि वह थॉमस की नियुक्ति के संदर्भ में अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करते हैं। वैसे तो प्रधानमंत्री विस्तार से अपनी बात संसद में कहेंगे, लेकिन उनकी इस संक्षिप्त सफाई से यह संकेत मिला कि वह अपनी भूल मान रहे हैं और ऐसा कुछ नहीं कहने वाले जिससे कार्यपालिका और न्यायपालिका में टकराव पैदा हो। ध्यान रहे कि इसके पहले वह यह कह चुके हैं कि न्यायपालिका को नीतिगत मामलों में दखल नहीं देना चाहिए। थॉमस के मामले की सुनवाई के दौरान भी केंद्र सरकार की ओर से यह कहा गया था कि न्यायपालिका को सीवीसी के चयन पर दखल देने का अधिकार नहीं। इन स्थितियों में प्रधानमंत्री की ओर से दिया गया संक्षिप्त बयान शुभ संकेत है। वह संसद में अपना और सरकार का पक्ष चाहे जिस तरीके से रखें, थॉमस मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से यह साफ हो गया कि एसएच कपाडि़या के नेतृत्व में शीर्ष अदालत एक बार फिर सक्रियता दिखाने के लिए तत्पर है। वैसे तो उसकी ओर से पहले भी न्यायिक सक्रियता प्रदर्शित की जा चुकी है, लेकिन पिछले कुछ समय में और विशेष रूप से पूर्व प्रधान न्यायाधीश बालाकृष्णन के कार्यकाल में सक्रियता के दर्शन नहीं हुए। इसके पीछे चाहे जो कारण हो, लेकिन यह महज दुर्योग नहीं हो सकता कि अब बालाकृष्णन भी आरोपों के घेरे में हैं। फिलहाल उनके मामले में भी केंद्र सरकार मौन साधे हुए है। अब जब थॉमस प्रकरण पर प्रधानमंत्री अपनी भूल स्वीकार करते दिख रहे हैं तब विपक्ष के लिए उचित यही होगा कि वह इस मसले पर विराम लगाए, लेकिन इसके साथ यह भी आवश्यक है कि प्रधानमंत्री इस पर विचार करें कि पहले राजा और फिर थॉमस को लेकर उनसे भूल कैसे हुई? क्या उनके ऊपर थॉमस की नियुक्ति के लिए कोई दबाव था अथवा कांग्रेस के राजनीतिक पंडितों ने उनकी अनदेखी कर दी? कहीं ऐसा तो नहीं कि कांग्रेस के रणनीतिकार केंद्र सरकार पर भारी पड़ रहे हैं? आम जनता से यह छिपा नहीं कि कांग्रेस वस्तुत: एक राजनीतिक मंडली द्वारा संचालित हो रही है। बेहतर हो कि कांग्रेसजन भी इस पर विचार करें कि क्या कारण है कि संप्रग के दूसरे कार्यकाल में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की भी किरकिरी हो रही है और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की भी? कांग्रेस और उसके नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के दामन पर जैसे दाग लग चुके हैं वे आसानी से छूटने वाले नहीं। देखना यह है कि कांग्रेस ये दाग धोने की ईमानदारी से कोई कोशिश करती है या फिर मामूली हेरफेर कर सुधरने का दिखावा भर करती है? यदि वह कुछ नए प्रवक्ता बनाने अथवा टीवी चैनलों में बहस के लिए उनकी टीम और बड़ी करने जैसे उपायों तक सीमित रहती है तो इसका मतलब होगा कि उसे अपनी प्रतिष्ठा की परवाह नहीं।
न्यायिक सुधार समय की जरूरत
हमारे मुल्क में ज्यादातर मुकदमे छोटे-छोटे झगड़ों और आपसी अहं की लड़ाइयों के नतीजे होते हैं। इनमें से बहुत सारे मुकदमे ऐसे होते हैं, जिन्हें अदालती गलियारों में सालों-साल भटकाने की जगह घंटो की बातचीत में आसानी से निपटाया जा सकता है। खास तौर से पारिवारिक और वैवाहिक विवादों के दीवानी मामले तो मध्यस्थता के जरिये बेहतर तरीके से और काफी कम समय में ही सुलझ सकते हैं। बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में लोगों को कमोबेश ऐसी ही एक नसीहत देते हुए कहा कि लंबी कानूनी लड़ाई पक्षकारों को सिर्फ बर्बाद करती है, जिसमें समय और पैसे दोनों का भारी खर्च होता है। लिहाजा, विवाद निपटारे के वैकल्पिक तंत्र यानी मध्यस्थता को ज्यादा से ज्यादा लोग अपनाएं। जस्टिस मार्कडेय काटजू और जस्टिस ज्ञानसुधा मिश्रा की पीठ ने पक्षकारों के साथ-साथ वकीलों को भी यह सलाह दी कि छोटे-छोटे मामलों में वे अपने मुवक्किलों को मध्यस्थता का रास्ता चुनने की सलाह दें। यदि विवाद दो भाइयों के बीच है तो हमारे विचार से मध्यस्थता से इसका समाधान खोजा जाना चाहिए। वकीलों और पक्षकारों को ऐसे मामलों में गांधीजी की सलाह के मुताबिक मध्यस्थता या पंचाट की मदद लेनी चाहिए, क्योंकि दीवानी प्रक्रिया संहिता की धारा 89 भी यही कहती है। पीठ ने अपने फैसले में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के इस कथन का बाकायदा जिक्र करते हुए कहा, महात्मा गांधी जो कि पेशे से वकील थे ने एक बार कहा था, वकील के तौर पर मैंने 20 साल प्रैक्टिस की। इसमें मेरा ज्यादातर वक्त सैकड़ों मामलों में समझौता करने में ही बीत गया। ऐसा करके मैंने कुछ नहीं खोया, पैसा भी नहीं और निश्चित रूप से आत्मा तो बिल्कुल नहीं। बहरहाल पीठ ने इस टिप्पणी के साथ याचिकाकर्ता बीएस कृष्णमूर्ति और बीएस नागराज के बीच संपत्ति विवाद से जुड़े मामले का निस्तारण करते हुए मामला बेंगलुरू के मध्यस्थता केंद्र को दोबारा सौंप दिया। सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा है ऐसा नहीं कि यह बहुत मुश्किल काम है, बल्कि मुल्क में समय-समय पर लोक अदालतों के जरिये इस तरह के छोटे-छोटे मुकदमों का निपटारा किया जाता रहा है। बीते दिनों ही दिल्ली हाईकोर्ट ने एक मेगा लोक अदालत के जरिए महज एक दिन में एक लाख से ज्यादा मुकदमों का निपटारा कर दिखाया था। हालांकि इन मुकदमों में ज्यादातर मुकदमे यातायात से संबंधित अपराधों, वैवाहिक विवाद, चेक बाउंस, पारिवारिक विवाद और छोटी-छोटी शिकायतों के थे, जिन्हें दोनों पक्षकारों से बातचीत कर आसानी से सुलझा दिया गया। वरना यह मुकदमें अदालतों में बरसों से खिंच रहे थे। हमारे यहां न्यायिक व्यवस्था कुछ ऐसी हो गई है कि छोटे से छोटे मामलों के निपटारे में बरसों लग जाते हैं। जबकि इन्हीं मुकदमों की यदि सही तरीके से सुनवाई की जाए तो ये महज कुछ महीनों में ही सुलझ जाएं। इसके पीछे देखें तो कहीं न कहीं हमारी अदालतों की कार्यप्रणाली भी जिम्मेदार है। गवाहों का उपस्थित न होना, सम्मन तामील न होना, प्रोसीक्यूशन सिस्टम द्वारा न तो समय पर चालान पेश करना और न ही गवाही करवाना जैसी प्रचलित लापरवाहियों के चलते कई बार जज चाहकर भी सुनवाई और जल्दी न्याय नहीं कर पाते। न्यायिक प्रणाली को दुरुस्त करने के लिए कुछ कदम जो सबसे पहले उठाए जाने की दरकार है वह है कि लॉ इंफोर्सिग एजेंसियां, अभियोजन और वकील अपना-अपना काम ईमानदारी से करें। बार-बार स्थगन की प्रवृत्ति पर रोक लगे, प्रोसीक्यूशन सिस्टम को सक्षम और मुस्तैद बनाया जाए, जजों के लिए इनसेंटिव सिस्टम लाया जाए और इन्वेस्टीगेशन विंग को पुलिस से अलग किया जाए। इसके अलावा एक अच्छी कोशिश तो यह होगी कि प्री-कोर्ट प्रोसीडिंग सिस्टम लाकर मामले को अदालत में जाने के पहले ही हल करने की कोशिश की जाए। बहरहाल अदालतों को मुकदमों के ढेर से निजात दिलाने के लिए केंद्र सरकार ने देर से ही सही अब राष्ट्रीय मुकदमा नीति बनाने का फैसला किया है। इस नीति का प्रमुख उद्देश्य लंबित मुकदमों की औसत अवधि 15 साल से कम करके तीन साल करना है। यही नहीं अदालती समय का ज्यादा से ज्यादा सदुपयोग करने के लिए सरकार ने सभी अदालतों में कोर्ट मैनेजर्स की नियुक्ति करने का भी अहम फैसला किया है। इस फैसले से न सिर्फ अदालतों पर पेंडिग मुकदमों का अंबार कम होगा, बल्कि प्राथमिक औपचारिकताएं पूरी होने के बाद ही केस जज के सामने सुनवाई के लिए सूचीबद्ध होगी और दायर करने की तारीख के हिसाब से सुनवाई की प्राथमिकता तय होगी। इस समय अदालत का 60 से 65 फीसदी अदालती समय विभिन्न औपचारिकताएं पूरी करने में चला जाता है। इसके अलावा भी अन्य कई वजहों से सूचीबद्ध मुकदमों की सुनवाई कई-कई बार स्थगित करनी पड़ती है। इस तरह देखने में आता है कि अदालतों का आधे से अधिक समय मुकदमों की सुनवाई स्थगित करने और अगली तारीख तय करने में चला जाता है। यह अलग बात है कि हलफनामा आदि दायर न होने पर भी जजों को सुनवाई टालनी पड़ती है। इन व्यवस्था को दुरुस्त करते हुए जजों के सामने मुकदमा सूचीबद्ध होने से पहले सभी औपचारिकताएं पूरी करने का जिम्मा अब कोर्ट मैनेजर्स का होगा। अदालतों द्वारा जारी नोटिस तामील हुए हैं या नहीं और याचिका में बताई गई कमी को सुधारा गया है या नहीं, इस पर पहले से ही गौर कर लिया जाएगा ताकि अदालत में केस सूचीबद्ध होने पर जज सुनवाई कर सकें। इस समय सुनवाई के लिए लगे सभी केस पहले कॉल किए जाते हैं और फिर यदि सभी कागजात दुरुस्त नहीं होते हैं तो मजबूरन अगली तारीख लगानी पड़ती है। हमारे यहां न्यायिक सुधार कई सालों से लंबित हैं फिर भी इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे थे। केंद्र सरकार ने देर से ही सही, मगर राष्ट्रीय मुकदमा नीति बनाने का जो अहम फैसला किया है उसकी तारीफ की जानी चाहिए। इस नीति के सही क्रियान्वयन का असर आने वाले कुछ सालों में अदालतों के कामकाज पर पड़ सकता है। नीति के अमल में आने के बाद जहां मुकदमों की संख्या घटेगी, वहीं मुकदमों की सुनवाई भी जल्दी हो सकेगी। इंसाफ में देरी से अक्सर जो नाइंसाफी होती है जाहिर है वह भी कम होगी। सरकार ने राष्ट्रीय न्याय आपूर्ति एवं कानूनी सुधार मिशन कायम करने का जो फैसला सैद्धांतिक तौर पर लिया है, उससे मुल्क के अंदर अदालतों में बुनियादी ढांचे के विकास में मदद मिलेगी। कुल मिलाकर बड़े पैमाने पर न्यायिक सुधार से ही मौजूदा न्याय व्यवस्था सुधारी जा सकती है। न्यायिक सुधार की राह में सरकार द्वारा उठाए गए हालिया कदम आश्वस्त करते हैं कि मुल्क में जल्द ही विधि का शासन कायम होगा। वर्तमान में न्यायिक प्रणाली की सक्षमता व कार्यप्रणाली को लेकर जिस तरह के सवाल उठ रहे थे उसके मद्देनजर यह एक दूरगामी कदम कहा जा सकता है।
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