अमेरिका ने आईएसआई को भी
अल कायदा जैसे आतंकी संगठनों की सूची में रखा है आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में पाकिस्तान अमेरिका को भले ही अपना रणनीतिक साझेदार मानकर इतराता रहा हो, लेकिन अमेरिकी अधिकारी उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई को एक आतंकवादी संगठन ही मानते हैं। ब्रिटिश अखबार "गार्डियन" में इस आशय की खबर पर संदेह करने का कोई कारण नहीं बनता, क्योंकि न तो अमेरिका ने और न पाकिस्तान ने ही इस खबर को गलत बताया है। अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने इस जानकारी की कड़े शब्दों में निंदा तो जरूर की है, लेकिन खबरों की सच्चाई और उसके गलत होने के बारे में चुप्पी बरतना ही उचित समझा है। ग्वांतानामो बे में जाँचकर्ताओं को बताया गया था कि आतंकवादी संगठन अल कायदा, हमास और हिज्बुल्लाह के साथ-साथ पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई भी एक खतरनाक और खौफनाक संगठन है। खबर के मुताबिक आईएसआई को उन ३६ आतंकवादी गुटों में शामिल किया गया है, जिनमें अल कायदा के सह-प्रमुख अयमान अल जवाहिरी के नेतृत्व वाला मिस्र का इस्लामिक जेहाद, ईरान का खुफिया विभाग और इख्वानुल मुसलमीन जैसे आतंकी गुट शामिल हैं। यों तो यह सूची वर्ष २००७ की है, लेकिन इसकी संभावना कम ही है कि उसमें अब भी कोई परिवर्तन किया गया होगा। वैसे यह सूची जगजाहिर नहीं भी हुई होती, तब भी आतंकवाद के संदर्भ में आईएसआई की भूमिका को लेकर शायद ही किसी को कोई मुगालता रहा होगा। सारी दुनिया जानती है कि पाकिस्तान दुनिया का एकमात्र देश है, जो अपनी नीति और रणनीति के तहत आतंकवाद को प्रश्रय देता है। पाकिस्तान को अगर आतंकवाद की नर्सरी कहा जाता है, तो यूँ ही नहीं कहा जाता। आतंकवादी कार्रवाइयों में आईएसआई की संलिप्तता बार-बार उजागर होती रही है। मुंबई मामले में भी उसकी भूमिका रही है, अब इसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं बची है। आज दुनिया में जहाँ कहीं भी आतंकवाद है, वहाँ आईएसआई की उपस्थिति भी देखी जा सकती है। अल कायदा, तालिबान या मुजाहिदीन जैसे आतंकवादी संगठनों के लिए वह हर जरूरी सुविधा मुहैया कराती है। इतना ही नहीं, आईएसआई उन्हें प्रशिक्षण देती है और उनकी कार्रवाइयों को समन्वित करने का काम भी करती है। भारत के लिए तो वह विशेष रूप से खतरनाक रही है। कारगिल घुसपैठ और मुंबई हमले से लेकर कश्मीर तक में वह आतंकवादी कार्रवाइयों को अंजाम देने में सहायक रही है। जहाँ तक भारत की बात है, तो उसे आईएसआई की भूमिका को लेकर कभी कोई संदेह नहीं रहा। भारत राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी आतंकवादियों को शह देने की उसकी योजना का पर्दाफाश करता रहा है, लेकिन दुर्भाग्य से अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने उसे पूरी गंभीरता से नहीं लिया। इस खुलासे के बाद अमेरिका और पाकिस्तान के संबंधों में खटास पैदा होना लाजिमी है, लेकिन ऐसा लगता है कि दोनों देशों की सरकारें इसे ज्यादा तवज्जो नहीं देंगी क्योंकि इससे आतंकवाद के खिलाफ चल रही लड़ाई कमजोर हो सकती है। हाँ, पाकिस्तान को अपने गिरेबान में एक बार जरूर झाँकना चाहिए।
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