भारत को पाकिस्तान के परमाणु बमों के जखीरे से उतना खतरा नहीं है जो पाकिस्तान ने जगह- जगह छिपा रखे हैं बल्कि सबसे बड़ा खतरा उसके द्वारा गुपचुप तरीके से इकट्ठा किए गए उस १३० किलोग्राम प्लूटोनियम और ३.६ टन संवर्धित यूरेनियम से है, जो कि खुला है। यदि ये आतंकियों के हाथ लग गए तो वे इसका इस्तेमाल कहीं भी कर सकते हैं।
भले ही भारत-पाक वार्ता की फिर से शुरुआत हो रही हो और भारत एवं पाकिस्तान के बीच अमन की आशा लगाए बैठे दोनों देशों के वासियों ने थोड़ी चैन की साँसें लेनी शुरू कर दी हों, पर पाकिस्तानी सेना और उनके साथ जुड़े पाकिस्तान पोषित जेहादियों को भारत द्वारा हल्के में लेना आत्मघाती होगा।
अगर पाकिस्तान वास्तव में भारत से अच्छे संबंध बनाना चाहता है, तब फिर अभी हाल में पाकिस्तान के लाहौर शहर में अपने लाखों सर्मथकों की रैली में उन्हें संबोधित करते हुए २६/११ मुंबई हमले के मास्टरमांइड एवं पाकिस्तानी जेहादी आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तोइबा के सर्वेसर्वा हाफिज मोहम्मद सईद की सीधे-सीधे भारतीय प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को धमकी कि या तो भारत कश्मीर से हट जाए वरना युद्ध के लिए तैयार हो जाए, भले ही वह परमाणु युद्ध ही क्यों न हो, का क्या तुक है? क्या इनके आका पाकिस्तानी सेना के वरदहस्त के बिना इतनी बड़ी जेहादी रैली हो सकती है? वह भी पाकिस्तानी सेना के गढ़ लाहौर में? लश्कर-ए-तोइबा राष्ट्रसंघ द्वारा प्रतिबंधित है।
हमारे हाफिज मोहम्मद सईद साहब के डिप्टी अबदुर रहमान तो उनसे भी आगे थे। उन्होंने माँग कर डाली की लश्कर-ए-तोइबा दस लाख जेहादी देगा। उनको आधुनिक राइफलें और अस्त्र पाकिस्तानी थल सेना चीफ जनरल कयानी साहब मुहैया कराएँ तथा पाकिस्तानी मंत्रिमंडल में "जेहाद" का एक स्वतंत्र मंत्रालय स्थापित हो। जाहिर है कि पाकिस्तानी सेना और उनके पाले हुए ये जेहादी भारत को जो संदेश दे रहे हैं, उसे भारत हलके में नहीं ले सकता।
पिछले करीब तीन महीनों से वैश्विक मीडिया में पाकिस्तान सुर्खियों में है। इसलिए नहीं कि रसातल में पहुँची पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में कोई सुधार हुआ है, या वहाँ दिनोंदिन बढ़ते जेहादी आत्मघाती हमले और उनमें मारे जाते निर्दोष पाकिस्तानी नागरिकों की संख्या में कमी आई है या पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में चीन ने जो अपने सैनिक तैनात किए हैं उन्हें उसने वहाँ से हटा लिया है। पाकिस्तान इसलिए सुर्खियों में है कि इतने नकारात्मक बिंदुओं के बावजूद पाकिस्तान विश्व में सबसे तेजी से परमाणु बम बना रहा है और वह भारत के परमाणु बम जखीरे से आगे निकल चुका है। यही नहीं, अमेरिका सहित सारे विश्व के विरोध के बावजूद पाकिस्तान ने चीन से दो और परमाणु रिएक्टर लगाने का करार कर लिया है जिससे उसकी परमाणु बम बनाने की क्षमता में और बढ़ोतरी हो जाएगी।
भारत को खतरा पाकिस्तान के उन १०० परमाणु बमों के जखीरे से उतना नहीं है जो पाकिस्तान ने जगह- जगह छिपा रखे हैं। इन परमाणु बमों को भारत पर गिराने के लिए पाकिस्तान को प्रक्षेपास्त्रों या लड़ाकू हवाई जहाजों की जरूरत पड़ेगी। फिर अगर पाकिस्तान इनका इस्तेमाल करता है तो इसका सीधा भारतीय जवाब होगा परंपरागत और परमाणु युद्ध।
भारत को सबसे ज्यादा खतरा पाकिस्तान द्वारा गुपचुप तरीके से इकट्ठा किए गए उस १३० किलोग्राम प्लूटोनियम और ३.६ टन संवर्धित यूरेनियम से है जो कि खुला है। मतलब इसके परमाणु बम नहीं बनाए गए हैं पर इससे करीब १०० परमाणु बम और बन सकते हैं। पाकिस्तानी सेना कहती है कि उसका यह परमाणु जखीरा, जो कि खुला है, बहुत सुरक्षित है और कई पहरों से घिरा हुआ है तथा इसकी चोरी नहीं हो सकती है। अमेरिका, जिसने पाकिस्तान के परमाणु बमों के जखीरों की सुरक्षा के लिए १००० करोड़ डॉलर खर्च करके सुरक्षा व्यवस्था कराई है, भी विश्व को यही बताता है कि यह जखीरा पूर्णतः सुरक्षित है।
हाल में विकीलीक्स से जो अमेरिकी गोपनीय दस्तावेज उजागर हुए हैं उससे साफ है कि अमेरिका का वह दावा झूठा है। पाकिस्तानी सेना इस डर से कि अमेरिकी तकनीकी लोग उसके बमों के जखीरे में कुछ गुपचुप गड़बड़ न कर दें, अमेरिकी तकनीकी और सैनिक सलाहकारों को वह अपने बमों के पास भटकने नहीं देती है। पाकिस्तानी बमों की सुरक्षा का काम असल में ब्रिटिश तकनीकी लोगों ने किया है और उन्होंने स्वयं इसकी सुरक्षा पर सवालिया निशान खड़े किए हैं।
अभी हाल ही में अमेरिकी नेशनल काउंटर टेरर सेंटर के अधीक्षक माइकेल लाइटर ने अमेरिकी संसद में बयान दिया है कि पाकिस्तान में जो "अलकायदा" आतंकी संगठन की शाखा है वह हर कीमत पर यह खुला "परमाणु पदार्थ" प्राप्त करना चाहती है ताकि उससे छोटा "डर्टी बम" बनाया जा सके जिसे किसी भी देश में सूटकेस के रूप में या आत्मघाती जेहादी के रूप में विस्फोट किया जा सके। इससे कितना भयंकर नरसंहार होगा इसकी सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि पाकिस्तानी सेना और मुंबई हमले के जिम्मेदार जेहादी संगठन लश्कर-ए-तोइबा का चोली-दामन का साथ है। भले ही भारत और विश्व खुले रूप में न कह रहा हो, पर जो साक्ष्य मुंबई हमले से उभर कर आए हैं उससे इतना तो साफ है कि यह पाकिस्तानी सेना की ही गुप्तचर संस्था आईएसआई के इशारों और मदद से हुआ है। उसी आईएसआई के तीन वर्षों तक सर्वेसर्वा रह चुके पाकिस्तानी जनरल कयानी आज पाकिस्तानी सेना के प्रमुख हैं।
कल्पना कीजिए कि भारत को परमाणु युद्ध की धमकी दे रहा लश्कर-ए-तोइबा को पाकिस्तानी सेना थोड़ा सा यह खुला परमाणु पदार्थ दे देती है, तो कहने की जरूरत नहीं कि उसके जेहादी मुंबई हमले की तर्ज पर भारत के कुछ अन्य शहरों में भी डर्टी बम आत्मघाती हमला कर सकते हैं। पाकिस्तान की सेना और उसकी सरकार कहती है कि उनका इस हमले से कोई लेना देना नहीं है। तब भारत सरकार का क्या जवाब होगा? क्या भारतीय नीति नियंता इसपर विचार-विमर्श कर रहे हैं?
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